क्यौं हँसि हेरि हरयौं हियरा अस क्यौ | कविता की संदर्भ सहित व्याख्या | सुजानहित | घनानंद | - Rajasthan Result

क्यौं हँसि हेरि हरयौं हियरा अस क्यौ | कविता की संदर्भ सहित व्याख्या | सुजानहित | घनानंद |

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क्यौं हँसि हेरि हरयौं हियरा अस क्यौ हित के चित चाह बढ़ाई।

काहे को बोलि सुधासने बैननि चैननि मैन- निसैन चढ़ाई।

सो सुधि मो हिय मैं घनआनन्द सालनि क्यों हूँ कटे न कढ़ाई ।

भीत सुजना अनीति की घाटी इते यै न जानिए कौन पढ़ाई || (२१)

क्यौं हँसि हेरि हरयौं

प्रसंग : यह पद्य कवि घनानन्द की रचना ‘सुजानहित’ से लिया गया है। प्रेम-विरह में बीती बातें और घटनाएँ याद आ – आकर मनश्चेतना को पीड़ित किया करती हैं। इस पद्य में भी विरही नायक अतीत का स्मरण कर प्रिया की निष्ठुरता पर टेसुए बिखरा रहा है। प्रिया की निष्ठुरता की दुहाई का वर्णन करते हुए इस पद्य में कवि कह रहा है

 

व्याख्या : ओ निष्ठुर प्रियतमे। पहले तुमने हँसकर मेरा मन क्यों हर लिया था। जो आज इस वियोग की आग से पीड़ित ही करना था, तो पहले हँसकर मन में प्रेम का भाव क्यों जगाया था, तो प्रेम करके मेरे मन में अनेक प्रकार की मधुर मिलन की कामना से भरी इच्छाएँ ही क्यों जगा और बढ़ा दी थीं?

कुछ तो सोचना था। तुमने पहले मीठी-मीठी प्यार भरी बातें करके मेरे मन को कायरता की सीढ़ियों पर क्यों चढ़ा दिया। अर्थात् तुम्हारी अमृत समान मधुर बातों में आकर मैंने तुम पर विश्वास किया? तुम्हें लेकर मन में तरह-तरह की कल्पनाएं और भावनाएं जगाई, इसी कारणमात्र तुम्हारा बिछोड़ा असह्य हो रहा है। तुम्हारे हँसकर मोह लेने, फिर प्यार से मीठी-मीठी बातें करने की याद आज भी रह-रहकर मेरे मन में चुभने और पीड़ित करने लगती है। मैं उन वादो को, उस प्रेम के भावों को अपने मन से निकाल देना चाहता हूं। पर प्रयत्न करने पर भी भूल और निकाल पाने में सफल नहीं हो पा रहा?

हे प्रिये सुनाज! पहले तुमने मुझसे प्रेम किया और अब वियोग की पीड़ा देकर अन्याय कर रही हो। प्रेम में तो ऐसा सब नहीं चलता। पता नहीं, तुमको प्रेम व्यापार में इस प्रकार उपेक्षा करने की अनीति का पाठ किस बेरहम ने पढ़ा दिया है कि जो सब-कुछ भूल-भालकर इतनी निष्ठुर बन गई हो। अपेन प्रेमी को इस कठोरता से पीड़ित एवं निराश कर रही हो ।

विशेष

1. पद्य विप्रलम्भ शृंगार का एक अच्छा उदाहरण कहा जा सकता है। विरहजन्य पीड़ा की अनुभूति सजीव-साकार हो उठी है।

2. पद्य में उपालम्भ का भाव भी स्पष्ट है । विगत की स्मृतियाँ जाग- जागकर प्रेमियों की पीड़ा और विरह – भावना को भड़काने वाली होती हैं, यह भी स्पष्ट है।

3. पद्य में उपमा, उल्लेख प्रश्न अनुप्रास आदि कई अलंकारों की ” चमत्कार पूर्ण स्थिति बड़ी स्वाभाविक बन पड़ी है।

4. पद्य की भाषा सजीव, मधुर और संगीतात्मक ब्रजभाषा है। उसमें माधुर्य गुण की प्रधानता, चित्रमयता एवं गत्यात्मकता भी स्पष्ट देखी जा सकती है।

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