जायसी मूलतः प्रेम और सौंदर्य के कवि हैं उक्ति की समीक्षा कीजिए |

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जायसी मूलतः प्रेम और सौंदर्य :— जायसी हिंदी के सूफी काव्य परंपरा के साधकों एवं कवियों के सिरमौर हैं। ये अमेठी के निकट जायस के रहने वाले थे, इसलिए इन्हें जायसी कहा जाता है। जायसी के यश का आधार है- पद्मावतइसकी रचना जायसी ने 1520 ई. के आसपास की। पद्मावत की विशेषताओं को देखकर यह स्वतः सिद्ध है कि जायसी मूलतः प्रेम के कवि थे।

जायसी मूलतः प्रेम और सौंदर्य

इस कृति के संबंध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा – “जायसी की अक्षय कीर्ति का आधार है ‘पद्मावत’, जिसके पढ़ने से यह प्रकट हो जाता है कि जायसी का हृदय कैसा कोमल और प्रेम की पीर’ से भरा हुआ था। क्या लोकपक्ष में, क्या आध्यात्म पक्ष में दोनों ओर उसकी गूढ़ता, गंभीरता और सरसता विलक्षण दिखाई देती है।” पद्मावत प्रेम की पीर की व्यंजना करने वाला विशद प्रबंध काव्य है । यह दोहा-चौपाई में निबद्ध मसनबी शैली में लिखा गया है।

जायसी ने इस प्रेम कथा को आधिकारिक एवं आनुषंगिक कथाओं के ताने-बाने में बहुत सुन्दर जतन से बाँधा है। पद्मावत आद्यांत ‘मानुष प्रेम’ अर्थात् मानवीय प्रेम की महिमा व्यंजित करता है। हीरामन शुक शुरू में कहता है: ‘मानुस प्रेम भएउँ बैकुंठी । नाहि त काहे छार भरि मूठी।’ रचना के अंत में यह छार भरि फिर आती है।

अलाउद्दीन पड्मिनी के सती होने के बाद चित्तौड़ पहुँचता है तो यह राख ही मिलती है: ‘छार उठाइ लीन्हि एक मूठी’ दीन्हि उड़ाइ परिथमी झूठी ।’ कवि ने कौशल से यह मार्मिक व्यंजना की है जो पमिनी रतनसेन के लिए ‘पारस रूप’ है वही अलाउद्दीन जैसे के लिए मुट्ठी भर धूल। मध्यकालीन रोमांचक आख्यानों का कथानक प्राय: बिखर जाता है, किन्तु पद्मावत का कथानक सुगठित है।

जायसी का सूफी काव्य अपनी अंतर्वर्ती विशेषताओं के कारण प्रेमाश्रयी, प्रेममार्गी, प्रेमकाव्य, प्रेमाख्यानके तथा कथाकाव्य के नाम से जाना जाता है। इससे स्पष्ट है कि जायसी की काव्यधारा की मूल चेतना प्रेम रही है। इस प्रेम में भी विरह स्थिति की प्रधानता रही है। इनके काव्य में प्रेम की उत्कट विरह व्यंजना और प्रतीकात्मकता दिखाई देती है।

इसीलिए सूफी कवि जायसी प्रेम की पीर’ के कवि कहे गए हैं। इन्होंने प्राय: भारत में लोक प्रचलित कथाओं को अपने प्रबन्ध काव्य का आधार बनाया है। उस कंथा को बड़े कौशल से सूफी मत के अनुकूल रूपायित किया है। इनमें भारतीय संस्कृति सुरक्षित ही नहीं है, वह समृद्ध भी हुई है।

अतः निर्विवाद रूप से यह कहा जा सकता है कि जायसी मूलत: प्रेम के कवि हैं।

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