बलवंत राय मेहता समिति प्रतिवेदन- 1957 - Rajasthan Result

बलवंत राय मेहता समिति प्रतिवेदन- 1957

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बलवंत राय मेहता समिति प्रतिवेदन- सामुदायिक विकास कार्यक्रम और राष्ट्रीय प्रसार सेवाओं के फलस्वरूप कुछ भौतिक उपलब्धियाँ अवश्य प्राप्त हुई किन्तु ग्रामीण लोगों के मानसिक सोच में कोई परिवर्तन नजर नहीं आया। ग्रामीणजन परतंत्र प्रशासन और स्वतंत्र भारत के प्रशासन में कोई अन्तर महसूस नहीं कर सके।

बलवंत राय मेहता समिति

नौकरशाही के हाथों में कार्यक्रमों की बागडोर के कारण जनता में नेतृत्व और हु पीलकदमी की भावना लेशमात्र भी नहीं बढ़ सकी। इन कार्यक्रमों की असफलता के कारण विरोधी दलों द्वारा ही आलोचना नहीं की गई वरन् स्वयं कांग्रेस के नेतागण भी इसकी कमियों के कारण इन कार्यक्रमों को समाप्त करने पर जोर डालने लगे। सरकारी, अर्द्धसरकारी और निजी संगठनों द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदनों में इन कार्यक्रमों की खामियों का खुलासा किया गया।

सामुदायिक विकास कार्यक्रम और राष्ट्रीय विस्तार सेवाओं के कारण सरकार द्वारा संसद के भीतर और संसद के बाहर तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। इन आलोचनाओं के परिणामस्वरूप आयोजन परियोजना समिति द्वारा बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में सामुदायिक परियोजनाओं और राष्ट्रीय प्रसार सेवा के अध्ययन दल की नियुक्ति वर्ष 1957 में की गई। इस द को आमतौर पर बलवंत राय मेहता समिति के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इस समिति ने अपना अध्ययन प्रतिवेदन दिसम्बर 1957 में प्रस्तुत किया जिसमें निम्न प्रमुख खामियों को उजागर किया: –

(1) सामुदायिक विकास कार्यक्रम और राष्ट्रीय प्रसार सेवा दोनों ही योजनाएं ग्रामीण जनता में पहल की भावना जाग्रत करने में विफल रही थी।

(2) पंचायत स्तर के ऊपर की स्थानीय निकायों ने सामुदायिक कार्यक्रम के सम्बन्ध में कोई उत्साह नहीं दिखाया था। और

(3) पंचायतों ने भी सामुदायिक विकास कार्यक्रम में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभायी थी।

बलवंत राय मेहता समिति की यह मान्यता थी कि इन दोनों योजनाओं में जनता की सक्रीय भागीदारी नहीं होने के कारण ये विफल रही हैं। समिति का कहना था कि जब तक ग्रामीण जनता को सीधे या उनके प्रतिनिधियों के माध्यम से इन कार्यक्रमों के निर्माण और उनके क्रियान्वयन में सम्मिलित नहीं किया जाता तब तक ग्रामीण जनता में पहल की भावना जागृत नहीं हो सकती।

इन कार्यक्रमों से जनता में अपनत्व की भावना तभी जागृत हो सकेगी जब उनकी सक्रयि भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। इस समिति की राय थी कि यह सुनिश्चित करने के लिए प्रजातान्त्रिक विकेन्द्रीकरण (Democrative Decentralistion) किया जाना अतिआवश्यक है।

 

बलवंत राय मेहता समिति के मत में प्रजातंत्र की परिकल्पना यह है कि केवल ऊपर से ही शासन न चलाया जाये बल्कि स्थानीय प्रतिभाओं का विकास किया जाये। यह तभी संभव है जबकि वे (स्थानीय लोग ) सक्रियता से सरकार के कार्यों में भाग ले सकें। इसे ही लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण कहते हैं। स्पष्ट है कि जिस राज्य में सत्ता का जितना अधिक विस्तार होगा वह उतना ही अधिक लोकतांत्रिक विस्तार होगा, वह उतना ही अधिक लोकतांत्रिक लोक कल्याणकारी राज्य होगा।

सर्वसाधारण के पास ज्यादा अधिकार आयेंगे तब वे अपना कर्तव्य पालन भी पूर्ण निष्ठा से करेंगे। विकेन्द्रित व्यवस्था में जनता अपने विकास एवं कल्याण सम्बन्धी कार्यो के लिए शासन पर निर्भर न रहकर स्वयं अपने साधनों से कार्य पूरा करने के लिए तत्पर रहेगी, क्योंकि उसके पास सत्ता होगी, अधिकार होंगे और उनके उपयोग करने की शक्ति भी उनके पास होगी। अतः विकेन्द्रीकरण और प्रजातंत्र में घनिस संबंध हैं तथा दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

बलवंत राय मेहता समिति ने सुझाव दिया कि शीघ्र ही लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण किया जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में लोकतांत्रिक आधार पर प्रतिनिधि संस्थाओं की स्थापना करके विकास की समस्त बागडोर उन्हें साँपना अति आवश्यक है। इस समिति का यह कहना था कि इन संस्थाओं का आधार वैधानिक हो, ये संस्थाएं वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित हों, और उनके पास समुचित कार्यपालिका शक्तियाँ और पर्याप्त स्रोत हों।

सरकार द्वारा इन संस्थाओं पर अत्यधिक नियन्त्रण नहीं रखा जाना चाहिए। इन्हें समुचित परामर्श तथा मार्गदर्शन मिलता रहना चाहिए ताकि ये गलतियाँ नहीं करें। ये प्रतिनिधि संस्थाएं स्थानीय विकास के लिए स्थानीय जनता की इच्छा अभिव्यक्ति के यन्त्र का कार्य करें।

बलवंत राय मेहता समिति ने इन संस्थाओं की स्थापना के लिए एक प्रारूप प्रस्तुत किया जिसमें ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खण्ड स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद के गठन का सुझाव दिया है। इस समिति की राय थी कि लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण का सर्वाधिक लाभ तभी मिलेगा जब तीनों ही स्तरों पर पंचायतीराज संस्थाओं का गठन कर एक साथ कार्य प्रारम्भ किया जाए।

इस समिति की मान्यता थी कि सम्पूर्ण ग्रामीण विकास के कार्य इन प्रजातांत्रिक संस्थाओं को सौंपा जाना श्रेयस्कर रहेगा। समिति का कहना था कि इन संस्थाओं में से प्रत्यक्ष निर्वाचन केवल ग्राम पंचायतों का किया जाए और पंचायत समिति और जिला परिषद का गठन अप्रत्यक्ष प्रणाली से किया जाए। पंचायत समिति को प्रमुख विकास की एजेंसी मानते हुए इसे अधिक से अधिक वित्तीय साधन और सहायता अधिक कार्मिक वर्ग और ज्यादा तकनीकी सहायता उपलब्ध करायी जाये। जिला परिषद का कार्य मात्र जिले की ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों और सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थाओं में सहयोग, समन्वय, पर्यवेक्षण और नियंत्रण का दायित्व रहे।

जिला स्तर तक के इस स्थानीय क्षेत्र में लोकतंत्र को पहुंचाकर वहां के लोगों में स्थानीय अभिरूचि व लगन पैदा किये जाने के सष्कध में प्रतिवेदन में कहा गया कि जब तक हम ऐसी प्रतिनिधात्मक व लोकतंत्रीय संस्था को ढूँढ नहीं निकालते या उसका निर्माण नहीं कर लेते जो यह देखने के लिए कि स्थानीय बातों पर व्य्य होने वाला धन स्थानीय आवश्यकताओं, अभिरूचि, स्थानीय देख-रेख तथा स्थानीय सतर्कता उपलब्ध कर सके, जब तक हम उसमे पर्याप्त शक्ति निहित नहीं करते और उसके लिए आवश्यक वित्त की व्यवस्था नहीं करते, तब तक हम विकास के क्षेत्र में कभी भी न तो स्थानीय अभिरूचि उत्पन्न कर सकेंगे और न स्थानीय उत्साह ही उत्तेजित कर सकेंगे।

राष्ट्रीय विकास परिषद् ने बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशों को सन 1958 में स्वीकार कर लिया था। अगस्त 1958 में आंध्र प्रदेश में कुछ क्षेत्रों में इस योजना को परीक्षण के तौर पर प्रारम्भ किया। इस परीक्षण के नतीजे सामने आये भी नहीं थे कि राजस्थान राज्य में 2 अक्टूबर 1959 को नागौर मे द्वीप प्रज्वलित कर इस त्रि-स्तरीय व्यवस्था का श्रीगणेश किया गया। थोड़े समय पश्चात आंध्र प्रदेश में भी पूरे राज्य में इसे 1959 में ही लागू कर दिया। अन्य राज्यों में यह व्यवस्था कुछ या अधिक परिवर्तन के साथ 1960—1961 में शुरू की गयी। राजस्थान और आध प्रदेश में लगभग इस त्रि-स्तरीय योजना को उसी रूप में प्रभावी बनाया गया जिस रूप में बलवंत राय मेहता समिति ने सुझाया था।

आगे चल कर राज्य सरकारों द्वारा अपने-अपने राज्य में पंचायती राज व्यवस्था का अध्ययन करने के उद्देश्य से समय-समय पर कुछ समितियों की नियुक्ति की गई । संघीय सरकार द्वारा भी वित्तीय प्रशासन, इनकी निर्वाचन व्यवस्था, ग्राम सभा आदि के अध्ययन के उद्देश्य से पृथक-पृथक समितियों का गठन किया गया। जनता पार्टी के सत्ता में आने पर संघीय स्तर पर 1977 में अशोक मेहता समिति का गठन किया गया, जिसने अपना प्रतिवेदन अगस्त 1978 में सरकार को प्रस्तुत किया। इस समिति द्वारा सम्पूर्ण पंचायती राज व्यवस्था के अध्ययन के पश्चात् प्रस्तुत प्रतिवेदन की महत्वपूर्ण बातों की यहां जानकारी प्राप्त करना उचित रहेगा।

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