भक्ति काव्य का स्वरूप और विकास | राम भक्ति और कृष्ण भक्ति |

भक्ति काव्य का स्वरूप और विकास | राम भक्ति और कृष्ण भक्ति |

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भक्ति काव्य का स्वरूप

इकाई के आरंभ में हम आपको भक्ति काव्य की दो प्रमुख धाराओं से परिचित करा चुके हैं। इन धाराओं को निर्गुण काव्यधारा और सगुण काव्यधारा कहा जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इन को दो-दो शाखाओं में विभाजित किया था। निर्गुण काव्यधारा को ज्ञानाश्रयी शाखा और प्रेममार्गी शाखा में तथा सगुण काव्यधारा को राम भक्ति शाखा और कृष्ण भक्ति शाखा में है। भक्ति काव्य का स्वरूप
इस भाग में हम इन चारों शाखाओं में काव्य के विकास का अलग-अलग अध्ययन करेंगे ताकि यह जान सकें कि भक्ति काव्य का विकास किस रूप में हुआ।

भक्ति काव्य का स्वरूप

ज्ञानाश्रयी शाखा
निर्गुण भक्ति काव्य की ज्ञानाश्रयी शाखा को संत काव्य भी कहा जाता है। इसका कारण संभवतः यह है कि निर्गुणपंथी कवियों को संत कहने की एक लंबी परंपरा रही है। भक्ति की जो लहर दक्षिण से आई थी, उसका सबसे पहला प्रभाव महाराष्ट्र के संत कवियों पर पड़ा था। नामदेव को हम हिंदी का पहला संत कवि कह सकते हैं। नामदेव (1270-1350 ने मराठी और हिंदी दोनों भाषाओं में काव्य रचना की। उन्होंने अपने काव्य में हिंदू मुसलमान दोनों के लिए सामान्य भक्ति का मार्ग प्रशस्त किया। भक्ति काव्य का स्वरूप
उत्तर भारत में भक्ति को लोकप्रिय बनाने में रामानंद का नाम विशेष उललेखनीय रामानंद रामानुज की शिष्य परंपरा से संबद्ध थे। इनका समय 14वीं शती माना जाता है। रामानंद भक्ति मार्ग में उदारता के पक्षधर थे। उन्होंने भक्ति पथ पर चलने वाले व्यक्ति के लिए वर्णाश्रम के बंधन को व्यर्थ माना। रामानंद खान-पान में छुआछूत मानने के भी विरोधी थे। वे स्वयं यद्यपि ब्राह्मण थे, लेकिन उदार दृष्टिकोण के कारण उनके कई शिष्य उस युग में छोटी समझी जाने वाली जातियों के थे।

इनमें रैदास, कबीर, धन्ना, सेना और पीपा विशेष उललेखनीय हैं। रैदास चमार, कबीर जुलाहा, धन्ना जाट, सेना नाई और पीपा राजपूत जाति के थे। ज्ञानाश्रयी शाखा से संबद्ध अन्य महत्वपूर्ण कवियों में सिख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक, दादू दयाल, मलूकदास, सुंदरदास आदि के नाम प्रमुख हैं।
यह आकस्मिक नहीं है कि ज्ञानाश्रयी शाखा के अधिकांश कवि निम्न समझी जाने वाली जातियों से आए थे। भक्ति काव्य की पृष्ठभूमि पर विचार करते हुए हमने बताया था कि 12वीं-13वीं शताब्दी में आर्थिक विकास ने उन जातियों की स्थिति में सुधार किया जो विभिन्न व्यवसायों या कृषि से जुड़ी थीं।
आर्थिक स्थिति में सुधार ने इन्हें अपनी सामाजिक स्थिति मजबूत करने का अवसर दिया। लेकिन यह काम सरल नहीं था। जातिप्रथा के रहते यह संभव नहीं था। भारत में वर्णाश्रम धर्म के विरोध की भी एक लंबी परंपरा रही है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार ‘सहजयान और नाथपंथ के अधिकांश साधक तथाकथित नीच जातियों में उत्पन्न हुए थे’ उन्होंने भी जाति प्रथा का उतनी ही उग्रता और तीव्रता से विरोध किया, जैसा हम कबीरदास के यहाँ पाते हैं।
भक्ति मार्ग ने इन्हें यह समझ दी कि सभी धर्म एक ही सत्य को व्यक्त करने के विभिन्न मार्ग हैं। अगर ईश्वर एक है तो मंदिर-मस्जिद का भेद, नमाज और पूजा का भेद व्यर्थ है। इस भावना ने जहाँ एक ओर उन्हें हिंदुओं और मुसलमानों में एकता के लिए काम करने को प्रेरित किया, वहीं दूसरी ओर उन्हें दोनों धर्मों में व्याप्त बुराइयों से समान रूप संघर्ष करने की प्रेरणा भी दी। नामदेव, कबीर, नानक, रैदास, दादूदयाल आदि सभी संत कवियों ने समान रूप से हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रयास किया। भक्ति काव्य का स्वरूप

बह्याचारों और सामाजिक कुरीतियों के विरोध का यह तात्पर्य नहीं है कि कबीर आदि संतों में सच्ची भक्ति भावना नहीं थी। उनके मानवीय दृष्टिकोण का ईश्वरीय आस्था से गहरा संबंध है। कबीर आदि संतों ने ईश्वर के उस रूप को अवश्य अस्वीकार किया जो सगुण पंथ की विशेषता है। कबीर आदि निर्गुण पंथी निर्गुण-निराकार ईश्वर में विश्वास करते थे।
उन्होंने अवतारवाद का दृढ़तापूर्वक खंडन किया। कबीर ने तो यहाँ तक कहा था कि ‘दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना/राम नाम का मरम है आना।’ अर्थात् जो राम को दशरथ पुत्र राम समझते हैं, वे राम शब्द के मर्म को जानते ही नहीं। यही कारण है कि संत मत में ईश्वर के नाम को ईश्वर से बढ़कर माना गया है। भक्ति काव्य का स्वरूप भक्ति काव्य का स्वरूप
संत मत में सृष्टि का कारण परब्रह्म को ही माना गया है। वह समस्त सृष्टि का कारण भी है और उसमें व्याप्त भी है इसलिए ब्रहम सर्वत्र विद्यमान है। वह हमारे हृदय में भी है। माया के कारण हम उसे पहचान नहीं पाते। लेकिन गुरु की कृपा से हमें आत्मज्ञान हो जाता है तो हम ब्रह्म के साक्षात् रूप को पहचान जाते हैं। इस आत्मज्ञान के बाद भक्त ब्रह्म को पाने के लिए तड़प उठता है। संत काव्य में यहीं पर प्रेम तत्व का प्रवेश होता है। भक्ति काव्य का स्वरूप भक्ति काव्य का स्वरूप

समस्त सृष्टि में ईश्वरीय सत्ता का अनुभव करना और उसे पाने के लिए तड़पना यही रहस्य भावना है जो संत काव्य की विशेषता है। ईश्वर और आत्मा (जीव) के संबंध को व्यक्त करने के लिए कबीर योग साधना की पद्धति का सहारा भी लेते हैं और उलटबाँसी का भी। उलटबाँसी में विपरीत कथन द्वारा आध्यात्मिक अर्थ की अभिव्यक्ति की गई है। जैसे ‘नैया बिच नदिया डूबति जाय।’ या ‘बरसै कंबल भीगे पानी’ । योग साधना से संबंधित सांकेतिक शब्दों, चाँद, सूर्य, नाद इड़ा, पिंगला, सुशुम्ना, आदि का प्रयोग करके उन्होंने अद्भुत रूपक बाँधे हैं। भक्ति काव्य का स्वरूप भक्ति काव्य का स्वरूप
नामदेव, कबीर, रैदास आदि संत कवियों ने सामान्य जन भाषा का प्रयोग किया है। उनकी काव्य भाषा में लोक प्रचलित शब्दों का प्रयोग तो मिलता ही है, साथ में ऐसे शब्दों का प्रयोग भी मिलता है, जिनका अर्थ योग साधना की परंपरा से परिचित होने पर ही जाना जा सकता है। फिर भी, इनके काव्य में भावों की सच्चाई और तीव्रता का बराबर अनुभव होता है।
संत कवियों ने मुक्तक काव्य की ही रचना की है। उन्होंने दोहा, चौपाई आदि छंदों का भी प्रयोग किया है। काव्यकला के मानदंड पर भले ही यह काव्य खरा न उतरता हो लेकिन भावों और विचारों की दृष्टि से इसकी श्रेष्ठता असंदिग्ध है।
ज्ञानश्रयी शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि कबीर ही हैं जिनके काव्य का विस्तृत अध्ययन हम अगली इकाई में करेंगे। कबीर के अतिरिक्त गुरुनानक, रैदास, दादू दयाल, सुंदरदास आदि इस धारा के प्रमुख कवि हैं। भक्ति काव्य का स्वरूप

प्रेममार्गी (सूफी) शाखा

भारत में सूफी मत का आगमन 12वीं शताब्दी से माना जाता है। सूफी मत इस्लाम का ही एक अंग है, लेकिन इसमें धार्मिक कट्टरता और असहिष्णुता नहीं है। सूफ़ी उन संतों को कहा जाता था जो अपने जीवन को ईश्वर के चरणों में अर्पित कर देते थे तथा बड़े कष्ट और दरिद्रता में जीवन व्यतीत करते थे। सूफ़ी मानते हैं कि विषय भोग से संघर्ष करके साधक को आत्मा द्वारा साधना करनी चाहिए। शुक्लजी के अनुसार सूफी मत में साधना की चार अवस्थाएँ बताई गई हैं :
  • 1. शरीअत- अर्थात् धर्म ग्रंथों के विधि निषेध का पालन करना।
  • 2. तरीक़त- अर्थात् बाहरी क्रिया-कलाप से परे होकर केवल हृदय की शुद्धता द्वारा भगवान का ध्यान करना।
  • 3. हकीकत- अर्थात् भक्ति और उपासना के द्वारा सत्य का बोध करना। इससे साधक तत्वदृष्टि से संपन्न और तीनों कालों (भूत, भविष्य और वर्तमान) का जानने वाला हो जाता है।
  • 4. मारफत- अर्थात् सिद्धावस्था । इस अवस्था में साधक की आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है और वे प्रभु से एकमेक हो जाता है।
सूफी कवि दो प्रकार के प्रेम का वर्णन करते हैं- इश्क मजाजी और इश्क हकीकी। इश्क मजाजी लौकिक प्रेम है तो स्त्री-पुरुष के बीच होता है। इश्क हकीकी वास्तविक प्रेम है जो ईश्वर और जीव के बीच होता है। सूफी कवि मानते हैं कि इश्क मजाजी द्वारा इश्क हकीकी को पाया जा सकता है। इसलिए वे अपने प्रबंध काव्यों के लिए लौकिक प्रेम कथाओं को आधार बनाते हैं और उनके माध्यम से आध्यात्मिक विचारों को व्यक्त करते हैं।

सूफी कवियों ने पुरुष को आत्मा का प्रतीक और प्रियतमा को परमात्मा का प्रतीक माना है। प्रेम ही प्रियतमा को प्राप्त करने का साधन है। लेकिन प्रियतमा के रूप का सच्चा ज्ञान गुरु की कृपा से होता है। प्रेम का मार्ग कांटों से भरा है। प्रेमी इस मार्ग की कठिनाइयों की चिंता किये बिना लगातार आगे बढ़ता जाता है। माया या शैतान भी प्रेमी के मार्ग में बाधा उत्पन्न करता है, गुरु की सहायता से प्रेमी उन बाधाओं को दूर हटाता है। सूफी काव्य का यही आध्यात्मिक सार है जिन पर उनके प्रबंध काव्य आधारित हैं।
सूफी कवियों ने लोक में प्रचलित प्रेम कथाओं को अपने काव्य का विषय बनाया है। इनके चरित्र इतिहास प्रसिद्ध व्यक्ति भी हो सकते हैं और काल्पनिक भी। लेकिन कथा का विकास प्रायः लोक विश्वासों के अनुसार होता है या कवि की कल्पना के अनुसार। इनका इतिहास से प्रायः संबंध नहीं होता।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, ‘कथानक को गति देने के लिए सूफी कवियों में प्रायः उन सभी कथानक रूढ़ियों का व्यवहार किया है जो परंपरा से भारतीय कथाओं में व्यवहृत होती रही हैं, जैसे-चित्र दर्शन, स्वप्न द्वारा अथवा शुक्र-सारिका आदि द्वारा नायिका का रूप देख या सुनकर उस पर आसक्त होना, पशु-पक्षियों की बातचीत से भावी घटना का संकेत पाना, मंदिर या चित्रशाला में प्रिय युगल का मिलन होना, इत्यादि। कुछ नई कथानक रूढ़ियाँ ईरानी साहित्य से आ गई हैं, जैसे प्रेम व्यापार में परियों और देवों का सहयोग, उड़ने वाली राजकुमारियाँ, राजकुमार का प्रेमी को गिरफ्तार करा लेना, इत्यादि ।

परंतु इन नई कथानक शैलियों को भी कवियों ने पूर्ण रूप से भारतीय वातावरण के अनुकूल बनाने का प्रयत्न किया है। अधिकांश सूफी कवियों के काव्यों का मूल आधार भारतीय लोक-कथाएँ हैं । (हिंदी साहित्य : उद्भव और विकास, पृ. 163) सूफी कवियों ने अपने प्रबंध काव्यों की रचना फारसी की मसनवी शैली में की है।
इस शैली में कवि आरम्भ में ईश्वर और मुहम्मद साहब की स्तुति करते हैं। अपने गुरु का स्मरण करते है। ग्रंथ के रचनाकाल का उल्लेख भी करते हैं। तथा उस समय के राजा या बादशाह का उल्लेख भी करते है। मसनवी शैली की इस परंपरा का पालन करने के बावजूद सूफी काव्य अपनी अंतः प्रकृति में भारतीय ही है। सूफी कवियों ने न केवल भारत में प्रचलित काव्य रूढ़ियों का प्रयोग किया बल्कि भारतीय दर्शन और योग साधना का उन पर गहरा प्रभाव था।
सूफी कवियों ने प्रायः एक ही काव्य पद्धति का प्रयोग किया है। प्रबंध काव्य के लिए उन्होंने दोहा-चौपाई छंदों का प्रयोग किया है। सूफी काव्यों की भाषा अवधी है तथा इनकी भाषा में लोकतत्व का प्रभाव अधिक है। सूफी कवि लौकिक प्रेम द्वारा आध्यात्मिक प्रेम का आभास देना चाहते थे इसलिए उन्होंने ऐसे अलंकारों का अधिक प्रयोग किया है जिसमें प्रस्तुत (लौकिक भाव) के द्वारा अप्रस्तुत (अलौकिक भाव) की व्यंजना हो सके।

सूफी कवियों विशेषतः जायसी पर रहस्यवाद का भी प्रभाव है, लेकिन उनका रहस्यवाद भावात्मक रहस्यवाद है। सूफी कवियों के रहस्यवाद की व्याख्या करते हुए आचार्य द्विवेदी कहते हैं, ‘सूफियों का रहस्यवाद अद्वैतवाद भावना पर आश्रित है। रहस्यवादी भक्त परमात्मा को अपने प्रिय के रूप में देखता है और उससे मिलने के लिए व्याकुल रहता है। जिस प्रकार मेघ और समुद्र के पानी में कोई भेद नहीं है, दोनों एक ही हैं, उसी प्रकार भक्त और भगवान में कोई भेद नहीं है।
फिर भी मेघ का पानी नदी का रूप धारण करके समुद्र के पानी में मिल जाने को आतुर रहता है। उसी श्रेणी की आतुरता भक्त में भी होती है। सूफी कवियों ने अपने प्रेम कथानकों की प्रेमिका को भगवान का प्रतीक माना है। जायसी भी सूफियों की इस भक्ति भावना के अनुसार अपने काव्य में परमात्मा को प्रिया के रूप में देखते हैं और जगत् के समस्त रूपों को उसकी छाया से उद्भाषित बताते हैं। उनके काव्य में प्रकृति उसी परम प्रिय के समागम के लिए उत्कंठित और व्याकुलता पाई जाती है।’
सूफी काव्य को अगर हम आध्यात्मिक अर्थ में न भी ग्रहण करें तो उसमें व्यक्त लोक जीवन का चित्रण अत्यंत मर्मस्पर्शी और प्रभावशाली है। जायसी का नागमती विरह वर्णन इस दृष्टि से उल्लेखनीय है। मुसलमान होते हुए भी सूफी कवियों ने हिंदू जीवन पद्धति और धार्मिक दार्शनिक मतों का जिस विश्वास और लगाव से चित्रण किया है।
वह सिर्फ उनकी उदारता का ही परिचायक नहीं है बल्कि भारतीय जीवन से उनके आत्मिक लगाव को भी व्यक्त करता है। सूफी काव्य परंपरा में मलिक मुहम्मद जायसी का नाम सर्वाधिक उल्लेखनीय है। इनके काव्य का अध्ययन हम इकाई पाँच में करेंगे। अन्य सूफी कवियों में मुल्ला दाऊद, कुतुबन, मंझन, उसमान आदि सूफी कवि प्रसिद्ध हैं।

कृष्ण भक्ति शाखा

विष्णु के अवतार के रूप में कृष्ण की उपासना का इतिहास कितना महत्व पुराना है, यह कहना मुश्किल है। लेकिन कृष्ण के माधुर्य रूप का प्रकाशन सर्वाधिक महत्वपूर्ण ढंग से भागवत पुराण में हुआ है। भागवत पुराण की रचना छठी और 9वीं शताब्दी के बीच मानी जाती है।
भागवत पुराण मध्यकालीन कृष्ण भक्ति साहित्य का प्रेरणा स्रोत रहा है। इसमें कृष्ण की बाल और कैशोर वय की लीलाओं का मार्मिक चित्रण किया गया है। इसमें कृष्ण और गोपियों के प्रेम तथा रासलीला का विशद और मनोहारी चित्रण किया गया है। भागवत पुराण में राधा का उल्लेख नहीं मिलता।
राधा कृष्ण की नायिका के रूप में संस्कृत कवि जयदेव के ‘गीतगोविंद’ में हैं। ‘गीत गोविंद’ 12वीं शताब्दी की रचना है। ‘गीत गोविंद’ में रास बसंत ऋतु में होता है, जबकि भागवत पुराण में रास शरद ऋतु में होता है। जयदेव के बाद बंगाल के कवि चंडीदास और मैथिली कवि विद्यापति ने भी राधा-कृष्ण के प्रेम को काव्य का विषय बनाया। चंडीदास और विद्यापति ने भी कृष्ण भक्ति काव्य की प्रेरणा दी है। यह अवश्य है कि विद्यापति के यहाँ राधा-कृष्ण के प्रेम चित्रण में अधिक मांसलता और शृंगारिकता पाई जाती है।

भक्ति आंदोलन के दौरान कृष्ण लीलाओं के गान की ओर कवियों को प्रेरित करने का श्रेय शुद्धाद्वैतवाद के प्रवर्तक बल्लभाचार्य को है। सूरदास बल्लभाचार्य के ही शिष्य माने जाते हैं। बल्लभाचार्य ने भक्ति के जिस सिद्धांत को प्रस्तुत किया उसे पुष्टि मार्ग कहा जाता है। ईश्वर के अनुग्रह या कृपा को पुष्टि कहा जाता है। पुष्टि चार प्रकार की मानी गई है :
1. मर्यादा पुष्टि : भगवान के गुणों का ज्ञान प्राप्त करते हुए और सामाजिक विधि निशेध तथा लोक मर्यादा का पालन करते हुए भक्ति करना ‘मर्यादा पुष्टि’ है।
2. प्रवाह पुष्टि : सांसारिक जीवन में रुचि रखते हुए भी भगवान के प्रति विशेष रुचि रखना ‘प्रवाह पुष्टि’ है।
3 . पुष्टि पुष्टि : भगवान का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर उसी के स्नेह में मग्न रहना ‘पुष्टि पुष्टि’ है। 3.
4. शुद्ध पुष्टि : एकांत प्रेम-पूर्वक तथा आत्म-समर्पण के भाव से भगवान के अनुग्रह पर जीवित रहते हुए उसकी लीला, गुण आदि में मग्न रहना ‘शुद्ध पुष्टि’ है।
बल्लभाचार्य ने ‘शुद्ध पुष्टि’ को ही भक्ति का श्रेष्ठ मार्ग स्वीकार किया है। शुद्ध पुष्टि में केवल प्रेम के द्वारा भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त की जाती है। इसी से हृदय में भक्ति की उत्पत्ति होती है।

पुष्टि मार्ग की भक्ति रागानुगा भक्ति है। इस भक्ति मार्ग में सांसारिक विधि निषेधों का पालन आवश्यक नहीं रह जाता। ईश्वर की कृपा स्वयं उसे कर्मों के फल से मुक्त कर देती है। बल्लभाचार्य के अनुसार कृष्ण ही सत्, चित और आनंद स्वरूप तथा परब्रहम है। कृष्ण की लीलाएँ किसी बाह्य कारण से नहीं है। कृष्ण की तरह कृष्ण की लीलाएँ भी नित्य हैं।
कृष्ण भक्त का कर्तव्य है कि वह कृष्ण के रूप-सौंदर्य और उनकी लीलाओं का ध्यान, स्मरण और कीर्तन करे। कृष्ण भक्त कवियों ने कृष्ण की लीलाओं का गायन सख्य भाव से किया। यानी उन्होंने कृष्ण को अपना सखा और बंधु माना जिसके कारण लीला के वर्णन में अधिक स्वाभाविकता और सौंदर्य आ सका है।
बल्लभाचार्य के मत को आगे बढ़ाने का श्रेय उनके पुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ को है। इन्होंने पुष्टिमार्ग को स्वीकार करने वाले आठ भक्त कवियों को अष्टछाप की संज्ञा दी है। ये हैं : कुंभनदास, सूरदास, परमानंददास, कृष्णदास, गोविंदस्वामी, नंददास, छीतास्वामी और चतुर्भुदास। इनमें से पहले चार बल्लभाचार्य के शिष्य थे और शेष चार गोस्वामी विट्ठलनाथ के शिष्य थे। अष्टछाप के सभी कवियों ने कृष्ण की लीलाओं का गान किया और उनके रूप-माधुर्य के वर्णन की और प्रवृत्त हुए।

कृष्ण के माधुर्य रूप की उपासना का यह लाभ अवश्य हुआ कि इसमें कृष्ण का लोकरंजक रूप उभरा। कृष्ण भक्ति काव्य में कृष्ण का एक ऐसा रूप व्यक्त हुआ है जो अपनी मनोहारी लीलाओं द्वारा लोक को आनंद पहुँचाता है। कृष्ण की बाल लीलाएँ-उनका माखन चुराना, गोपियों की मटकियाँ फोड़ देना, गाएँ चराना, ग्वाल-बालों के साथ जंगल में घूमना और गोपियों के साथ रास रचना वस्तुतः लोकरंजन के लिए ही हैं। यह अवश्य है कि राधा-कृष्ण या कृष्ण गोपियों के प्रेम वर्णन में लोक मर्यादा की पूर्ण अवहेलना है।
गोपियाँ सामाजिक मर्यादाओं का त्याग कर कृष्ण के प्रेम में निमग्न रहती हैं। कृष्ण की लीलाओं की व्यंजना करते हुए भक्त कवियों ने ऐसी मनोदशाओं का चित्रण भी किया है जो सामान्य जन को अधिक आकृष्ट करती हैं। जैसे कृष्ण का रोना, खीझना, नटखटपन, गोपियों यशोदा से उपालंभ, यशोदा का बाल कृष्ण के डाँटना-फटकारना आदि। इन मनोदशाओं में जीवन की स्वाभाविकता और सहजता के दर्शन होते हैं। का
कृष्ण काव्य के माध्यम से शृंगार का भी विशद चित्रण हुआ है- विशेष रूप से विरह का कृष्ण काव्य का शृंगार पक्ष उतना मांसल और विलासमय नहीं है जितना कि बाद में रीतिकालीन काव्य हो गया था। सूरदास ने ‘भागवत’ की परंपरा के अनुसार विरह वर्णन में भ्रमर गीतों की रचना भी की है। लेकिन सूर की यह विशेषता है कि उन्होंने भ्रमर गीतों को दार्शनिक आयाम भी दिया है। उन्होंने निर्गुण मत के खंडन के लिए भी भ्रमर गीतों का इस्तेमाल किया है।

कृष्ण भक्त कवियों की प्रवृत्ति मुक्तक रचना की ओर ही रही। उन्होंने कृष्ण के जीवन का संपूर्ण चित्र प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उनकी बाल और कैशोर्य जीवन से संबंधित लीलाओं तक ही अपने काव्य को सीमित रखा। इन लीलाओं के चित्रण में भी उनकी रुचि कथा कहने की ओर नहीं थी। इन कवियों ने कृष्ण के विभिन्न रूपों और लीलाओं में निहित सौंदर्य के उद्घाटन में ही अधिक रुचि ली, विशेषतः लीलाओं के चित्रण में विभिन्न मनोदशाओं का चित्रण तो अत्यंत मार्मिक और चमत्कारपूर्ण रूप से व्यक्त हुआ है।
कृष्ण भक्ति काव्य प्रमुखतः गेय पदों में हैं जो विभिन्न राग-रागनियों पर आधारित हैं। अपने समृद्ध संगीत पक्ष के कारण ही सूरदास की अमर रचना ‘सूरसागर’ को संगीत सागर भी कहा जाता है। कृष्ण भक्ति काव्य की रचना ब्रज भाषा में हुई है।
इस काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि सूरदास हैं। मीरा भी इस धारा की महत्वपूर्ण कवयित्र व हैं। इस खंड में आप इन कवियों का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

राम भक्ति शाखा

राम का चरित्र काव्य लिखने की प्रेरणा बराबर देता रहा है। राम के चरित्र को केंद्र में रखकर वाल्मीकि ने संस्कृत में ‘रामायण’ की रचना की थी। वाल्मीकि भारतीय परंपरा में आदि कवि माने जाते हैं ‘रामायण’ की रचना का समय ईसा से पाँचवीं-छठी शताब्दी पूर्व से पहले का माना जाता है। वाल्मीकि के बाद भी रामकथा को आधार बनाकर काव्य रचना होती रही। इनमें संस्कृत कवियों के अतिरिक्त प्राकृत और अपभ्रंश में रचना करने वाले बौद्ध और जैन कवि भी शामिल हैं।
मध्यकाल में रामानुज ने राम की उपासना को लोक में प्रचारित किया। स्वामी रामानंद ने भी राम के नाम को परब्रह्म का प्रतीक बताया। रामानंद का आग्रह निर्गुण निराकार राम के प्रति नहीं था, लेकिन वे इतने उदार थे कि उन्होंने निर्गुण राम (परब्रह्म) और सगुण राम दोनों की भक्ति को प्रोत्साहित किया।
रामकाव्य की लंबी परंपरा के बावजूद रामकथा को लोकप्रियता तुलसीदास के कारण ही मिली। तुलसीदास की ‘रामचरित मानस’ हिंदू परिवारों में धार्मिक ग्रंथ की तरह पूज्य हो गई। लेकिन तुलसीदास की भक्ति कृष्ण भक्त कवियों से कई अर्थों में भिन्न थी। हम बता चुके हैं कि कृष्ण भक्त कवि लीला गायन पर जोर देते थे और ईश्वर की लीला का कोई बाह्य उद्देश्य नहीं मानते थे। इसके विपरीत तुलसीदास आदि राम भक्त कवि यह मानते थे कि भगवान दुष्टों का दलन करने और साधुओं की रक्षा करने के लिए अवतार लेते हैं।

राम भक्त कवियों की इस मान्यता के कारण उनके काव्य में राम एक ऐसे ईश्वर के रूप में चित्रित हुए हैं जिसने लोक कल्याण की भावना से प्रेरित होकर अवतार लिया है। यही कारण है कि राम भक्त कवि के समक्ष राम का ऐसा रूप रहता है जिसका उद्देश्य अपनी लीलाओं द्वारा लोक को आनंद पहुँचाना ही नहीं है वरन् उन्हें कष्टों और पीड़ाओं से मुक्त करना भी है। तुलसीदास की भक्ति रागानुगा भक्ति की अपेक्षा वैधी भक्ति के अधिक नजदीक है।
उनके यहाँ शास्त्र सम्मत विधि-निषेधों का पालन अनिवार्य है। यहाँ तक कि राम भी मर्यादा से बंधे हैं और इसीलिए वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। तुलसीदास ने राम की आराधना दास्यभाव से की है। इसलिए उनके यहाँ राम के ऐश्वर्य और प्रभुत्ता के चित्रण पर अधिक बल है।
रामभक्त कवियों के सामने आदर्श लोकमंगल का रहा इसलिए उन्होंने ईश्वर के एक ऐसे आदर्श रूप को सामने रखा जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रेरणा दे। यही कारण है कि राम भक्ति काव्य में लोकजीवन की उपेक्षा नहीं है बल्कि जीवन के संघर्षों के बीच ही उनके चरित्र का उज्ज्वल रूप हमारे सामने आता है।
राम के शील और सौंदर्य का दर्शन हम जीवन संग्राम के बीच ही पाते हैं। सीता का त्याग और पतिव्रत्य, भरत और लक्ष्मण का राम के प्रति भ्रातृत्व प्रेम तथा हनुमान की स्वामी भक्ति जीवन संघर्षों के बीच ही निखार पाते हैं।

रामभक्त कवियों के सामने समाज की मर्यादा की रक्षा करना हमेशा उद्देश्य रहा, इसलिए उन्होंने विरोधी प्रवृत्तियों के बीच समन्वय का प्रयास किया। तुलसीदास ने शैव और वैष्णव, निर्गुण और सगुण, ज्ञान और भक्ति, लोक और शास्त्र, वैराग्य और गार्हस्थ्य आदि विरोधी प्रवृत्तियों के बीच समन्वय का प्रयास किया।
राम भक्त कवियों में अपनी दीनता का भाव भी गहरे तक समाया हुआ है। अपनी दीनता का बोध और ईश्वर से अपनी मुक्ति की कामना, उसके समक्ष अनुनय-विनय भी इस काव्य की एक अन्य प्रमुख विशेषता है।
राम भक्त कवियों ने राम के जीवन को आधार बनाकर प्रबंध काव्य भी लिखे और मुक्तको की रचना भी की। उन्होंने अवधी भाषा को भी अपनाया और ब्रजभाषा को भी। काव्य रचना के लिए उन्होंने दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त, सवैया, छप्पय आदि विभिन्न छंदों का प्रयोग किया। उन्होंने विभिन्न राग-रागनियों से आबद्ध गेय पदों की भी रचना की।
उनके काया में काव्यकला की पराकाष्ठा दिखाई देती है। प्रबंध काव्य में ‘रामचरित मानस’ गीतों में ‘गीतावली’, गेय पदों में ‘विनय पत्रिका’ के पदों की श्रेष्ठता असंदिग्ध हैं। राम भक्ति काव्य में जो स्थान गोस्वामी तुलसीदास का है, वह किसी अन्य को प्राप्त नहीं है। इनके काव्य के संबंध में आप इसी पाठ्यक्रम के दूसरे खंड में विस्तृत अध्ययन करेंगे। तुलसीदास के अतिरिक्त अन्य उललेखनीय कवि हैं : अग्रदास, ईश्वरदास, नाभादास, केशवदास आदि।

यह भी पढ़े

  1. भक्ति काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ |
  2. भक्तिकाव्य स्वरुप और विकास |

 

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