मतिराम के अलंकार निरूपण के गुण-दोषों का विवेचन कीजिए | - Rajasthan Result

मतिराम के अलंकार निरूपण के गुण-दोषों का विवेचन कीजिए |

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मतिराम के अलंकार निरूपण – विवेचन ‘भरत के नाट्यशास्त्र’ से सर्वप्रथम उपलब्ध होता है, जहाँ केवल चार अलंकारों – उपमा, रूपक, दीपक और यमक का वर्णन है। भरत के पश्चात् भामह तक यद्यपि साहित्यशास्त्र का कोई ग्रंथ प्राप्य नहीं पर इतना अवश्य है कि अलंकार भी इस काल के आचार्यों के विवेचन का विषय रहा होगा क्योंकि भामह ने उक्त चार अलंकारों के अतिरिक्त अन्य 12 अलंकारों का उल्लेख करते हुए इनके सम्बन्ध का संकेत मेधावी आदि आचार्यों की ओर किया है।

इस प्रकार संस्कृत – अलंकार शास्त्र का क्रमबद्ध विकास तो भरत से ही आरम्भ हो जाता है, किन्तु इसकी अविच्छिन्न परम्परा भामह से आगे ही मिलती है। भामह ने स्वयं अपने ‘काव्यालंकार के अन्तर्गत 23 नवीन अलंकारों का आविष्कार किया है।

इसके पश्चात् दण्डी, उद्भट, रुद्रट, मम्मट आदि सभी आचार्यों ने इस विषय में अपना-अपना योगदान किया, यहाँ तक कि अप्पय दीक्षित के समय तक अलंकारों की संख्या 150 तक पहुँच गई । किन्तु इन सभी अलंकारों को सब आचार्यों ने ज्यों-का-त्यों ग्रहण नहीं किया, किसी ने कुछ को तिरस्कृत किया और किसी ने निरसित ।

मतिराम के अलंकार निरूपण

यही कारण है कि मम्मट के ‘काव्यप्रकाश’ में केवल 68 अलंकारों का विश्वनाथ के ‘साहित्यदर्पण’ में 89 का तथा अप्पय दीक्षित के ‘कुवलयानन्द’ में 123 का वर्णन उपलब्ध होता है। फिर भी इन तीनों ग्रंथों में विशेषत: ‘कुवलयानन्द में – पूर्ववर्ती आचार्यों द्वारा उद्भावित प्रसिद्ध अलंकारों में से लगभग सभी का सरस और सुबोध वर्णन है।

रीतिकालीन कवियों का उद्देश्य उन सभी सर्व स्वीकृत अलंकारों को संस्कृत से ब्रजभाषा के अन्तर्गत सुबोध और संक्षिप्त रूप में लाने का था।

चूंकि इन दोनों दृष्टियों से ‘कुवलयानन्द’ अपेक्षाकृत अधिक उपयुक्त था तथा अलंकारों की संख्या भी इसमें सर्वाधिक थी। यही कारण है कि इन लोगों ने अपने अलंकार – विवेचन का मूल आधार इस ग्रंथ को ही बनाया है।

मतिराम ने भी अपने समकालीनों के समान अपने अलंकारविवेचन का आधार ‘कुवलयानन्द’ को ही बनाया, पर अप्पय दीक्षित का उन्होंने अन्धानुकरण नहीं किया, जहाँ इनकी कोई बात नहीं जंची, वहां संस्कृत-काव्य-शास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथों ‘काव्यप्रकाश’ और ‘साहित्यदर्पण’ का भी आश्रय लिया है। 

अलंकार का शाब्दिक अर्थ है जो शोभा बढ़ावे | अलंकरोतीति अलंकार । इसी अर्थ को ग्रहण करते हुए प्रायः सभी आचार्यों ने अलंकारों का निरूपण करने से पूर्व इन्हें काव्य के शोभावर्द्धक धर्म कहा है। परन्तु आश्चर्य की बात है कि मतिराम ने अलंकार का लक्षण नहीं दिया, विशेषतः उस दशा में जबकि वे इसके भेदोपभेदों का वर्णन अत्यन्त विस्तार और मनोयोग के साथ कर रहे हैं।

वास्तव में विवेचनगत यह अभाव उनका दोष ही कहा जाना चाहिए, क्योकि अलंकार की परिभाषा के बिना इसके भेदों का वर्णन पाठक की बुद्धि के लिए सरलता से ग्राह्य नहीं हो सकता।

इस बात को यद्यपि यह कहकर टाला जा सकता है कि उनके अलंकार – विवेचन के आधार-ग्रंथ-‘कुवलयानन्द’ में अलंकार का लक्षण नहीं दिया गया, पर यह तर्क इसलिए मान्य नहीं हो सकता क्योंकि जब अलंकारों के भेदों और लक्षणों के सम्बन्ध में वे अप्पय दीक्षित के पूर्ववर्ती संस्कृताचार्यों- मम्मट और विश्वनाथ का आश्रय ले सकते थे तो अलंकार के लक्षण के लिए उन्हें संकोच क्यों हुआ?

दूसरे यह उनका अपनी मौलिकता दर्शाने का प्रयास भी नहीं कहा जा सकता अलंकार-विवेचन में वे संस्कृत ग्रंथों के आधार को स्पष्ट शब्दों में स्वीकार करते हैं

संस्कृत को अर्थ लै भाषा शुद्ध विचार ।

उदाहरण क्रम ए किए लीजो सुकवि सुधार ||10||

(अलंकार पंचाशिका )

तब इसका क्या कारण है? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि वे मूलतः रसवादी ही थे और अलंकार की परिभाषा की जितनी अपेक्षा थी, वह उन्होंने पृथक रूप से न देकर कवि निवेदन के अन्तर्गत संकेत रूप में दे दी है

भावसिंह की रीझ कौं कविता भूषन धाम ||

ग्रंथ सुकवि ‘मतिराम’ यह कीनो ‘ललितलालम’ ।।38।।

(ललितललाम)

यहाँ ‘कविता भूषण’ से स्पष्ट ही है कि वे अलंकारों को वाणी के आभूषण मात्र मानते हैं । चूंकि शरीर के लिए धर्म की अपेक्षा आभूषण कम महत्त्वपूर्ण होते हैं, अतएव उनके ‘भूषण’ शब्द के प्रयोग से यह निष्कर्ष निकाल लेना भी अपने आप में सहज ही है कि मम्मट के समान ये भी अलंकारों को काव्य के लिए अनिवार्य नहीं समझते।

मतिराम के अलंकार 

निरूपण सम्बन्धी दो ग्रंथ ही उपलब्ध होते हैं—‘ललितललाम’ और ‘अलंकार पंचाशिका’। इनमें ‘ललितललाम’ विशालकाय ग्रंथ है। इसमें सामान्य रूप से सभी प्रसिद्ध अर्थालंकारों का वर्णन किया गया है। ‘अलंकार पंचाशिका’ कलेवर की दृष्टि से अपेक्षाकृत संकुचित है। जैसाकि ‘पंचाशिका’ शब्द से ही स्पष्ट है, इसमें कवि का अभीष्ट केवल 50 अलंकारों के वर्णन का रहा होगा।

किन्तु इस ग्रंथ की प्रति खण्डित होने के कारण सम्प्रति 40 अलंकारों का वर्णन ही मिलता है – भेदोपभेद मिलाकर भी 48 ही बैठते हैं। दूसरे जिन अलंकारों का इसमें वर्णन हुआ है उनमें से अधिकांश ऐसे हैं जो अधिक प्रसिद्ध नहीं। वैसे इतना अवश्य है कि इनमें से ऐसा कोई अलंकार नहीं जिसका ‘ललितललाम’ में निरूपण न हुआ हो ।

वस्तुतः इस कृशकाय पुस्तिका की रचना कवि ने अलंकार – निरूपण अथवा आचार्यत्व की दृष्टि से नहीं की, प्रत्युत अपने आश्रयदाता पर स्वतन्त्र रूप से लिखे छन्दों में अलंकार – विशेष देखकर उन्हें तत्सम्बन्धी लक्षण- सहित प्रस्तुत कर पुस्तक का रूप दे दिया है। यहाँ हम मतिराम के अलंकार – निरूपण की परीक्षा, ‘ललितललाम’ के आधार पर ही कर रहे हैं।

विवेच्य – अलंकार 

पर निवेदन किया जा चुका है कि मतिराम के अलंकार – विवेचन का मुख्य आधार – ग्रंथ अप्पय दीक्षित का ‘कुवलयानन्द’ है। इस ग्रंथ के अन्तर्गत क्रमश: इन 123 अलंकारों का वर्णन किया गया है-

1. उपमा (पूर्ण और लुप्त), 2. अन्वय, 3. उपमेयोपमा, 4. पंच-विध प्रतीप, 5. रूपक, (1. अभेद, अधिक, हीन और अनुभय, 2. ताद्रू प्य – अभेद, हीन और अनुभय), 6. परिणाम, 7, द्विविध उल्लेख, 8-9-10. स्मृति-भ्रान्ति सन्देह, 11. अपह्नुति (शुद्ध हेतु, पर्यस्त, भ्रान्ति, छेक और कैवत),

12. उत्प्रेक्षा (1. वस्तु उक्तविषया और अनुक्तविषया, 2. हेतु सिद्धविषया और असिद्ध विषया 3. फल – सिद्ध-विषया और असिद्ध विषया)

13. अतिशयोक्ति (रूपका, सापह्नवा, भेदका, सम्बन्धा, असम्बन्धा, चपला, अक्रमा और अत्यन्ता),

14. तुल्योगिता, 15. दीपक, 16. आवृत्ति दीपक, 17, प्रतिवस्तूपमा, 18. दृष्टान्त, 19. निदर्शना, 20. व्यतिरेक 21. सहोक्ति, 22. विनोक्ति, 23. समासोक्ति, 24. परिकर, 25. परिरांकुर,

26. श्लेष (वर्ण्यानेक विषय, अवर्णानेक विषय और वर्ण्यावर्ण्यानेक विषय ) 27. अप्रस्तुतप्रशंसा, 28. प्रस्तुतांकुर, 29. पर्यायोक्त, 30. व्याजस्तुति, 31. व्याजनिन्दा, 32. त्रिविध आक्षेप, 33. विरोधाभास; 34. षष्ठ – विधविभावना, 35. विशेषोक्ति, 36. असम्भव, 37. विविध असंगत, 38. त्रिविध विषम, 39. त्रिविध सम, 40. विचित्र, 41. द्विविध अधिक, 42. अल्प, 43. अन्योन्य, 44 त्रिविध विशेष, 45. द्विविध व्याघात, 46. कारणमाला, 47. एकावली, 48. मालादीपक, 49. सार, 50 यथासंख्य,

 

51. द्विविध पर्याय, 52. परिवृत्ति, 53. परिसंख्या, 54 विकल्प, 55. द्विविध समुच्चय, 56. कारक दीपक, 57. समाधि, 58. प्रत्यनीक, 59. अर्यापत्ति, 60. काव्यलिंग, 61. अर्थान्तरन्यास, 62. विकस्वर, 63. प्रौढोक्ति, 64. संभावन, 65. मिथ्याध्यवसित, 66. ललित, 67. त्रिविध प्रहर्षण, 68. विषादन 69. त्रिविध उल्लास, 70. अवज्ञा, 71. अनुज्ञा, 72. लेश, 73. मृद्रा, 74. रत्नावली, 75. तद्गुण,

 

76. द्विविध पूर्वरूप, 77. अतद्गुण, 78. अनुगुण, 79. मीलित, 80. सामान्य, 81-82. उन्मीलित-विशेष, 83. द्विविध उत्तर, 84. सूक्ष्म, 85. पिहित, 86. व्याजोक्ति, 87. गूढोक्ति, 88 विवृतोक्ति, 89. युक्ति, 90. लोकोक्ति, 91. छेकोक्ति, 92. वक्रोक्ति ( श्लेष और काकु), 93. स्वभावोक्ति, 94. भाविक, 95. उदात्त, 96. अत्युक्ति; 97. निरुक्ति, 98 प्रतिबन्ध, 99. विधि, 100 हेतु,

101. रसवत्, 102. प्रेयस, 103. ऊर्ध्वस्वि, 104. समाहित, 105. भावोदय. 106. भावसन्धि, 107. भावशबला, 108. प्रत्यक्ष, 109. अनुमान, 110. उपमान; 111. शब्दप्रमाण, 112. स्मृति, 113. श्रुति, 114. अर्थापत्ति, 115. अनुपलब्धि, 116. सम्भव, 117. ऐतिह्य, 118. अलंकार संसृष्टि, 119. अंगागिभावसंकर, 120. समप्राधान्यसंकर, 121. सन्देहसंकर, 122. एकवचनानुप्रवेशसंकर, 123. संकरसंकर ।

मतिराम ने इनमें से प्रथम 100 अलंकारों को थोड़े हेर-फेर के साथ ज्यों-का-त्यों ग्रहण कर लिया है। एक ओर जहाँ ‘मालोपमा’ और ‘रशनोपमा’ नामक उपमा के दो भेदों को स्वतन्त्र अलंकारों के रूप में इनके बीच समाविष्ट किया है।

वहाँ दूसरी ओर ‘काव्य-लिंग’ का ‘हेतु’ में तथा ‘असम्बन्धातिशयोक्ति’ का ‘सम्बन्धातिशयोक्ति’ में अन्तर्भाव कर दिया है। ‘उत्तर’ अलंकार के प्रथम भेद को ‘गढ़ोत्तर’ तथा इसके द्वितीय भेद को ‘चित्र’ नामक पृथक् अलंकार बना दिया है। किन्तु यह उनकी मौलिक उद्भावना नहीं।

‘मालोपमा’ और ‘रशनोपमा’ तो साहित्यदर्पणकार से ली गई है। काव्यलिंग का ‘हेतु’ में अन्तर्भाव उन्होंने मम्मट से संकेत करते हुए किया है। ‘काव्यप्रकाश’ में ‘हेतु’ नामक अलंकार नहीं माना गया, इसे ‘काव्यलिंग’ में अन्तर्भूत कर दिया गया है।

मतिराम ने इसके विपरीत ‘काव्यलिंग’ के स्थान पर ‘हेतु’ को ग्रहण करते हुए उसे इसका भेद बता दिया है। इसी प्रकार असम्बन्धातिशयोक्ति’, ‘सम्बन्धातियोक्ति’ का अवर भेद भी उन्होंने विश्वनाथ से संकेत ग्रहण करके ही बनाया है।

‘साहित्यदर्पण’ की कारिका के इस अंश – ‘ सम्बन्ध सम्बन्धस्त द्विपर्यया” में स्पष्टतः दोनों के ऐक्य की ओर संकेत है। ऐसे ही ‘उत्तर’ अलंकार के प्रथम भेद को ‘गढ़ोत्तर’ तथा द्वितीय को ‘चित्रोत्तर’ नाम स्वयं कुवलयानन्दकार ने ही दिया है।

जहाँ तक शेष 23 अलंकारों का प्रश्न है मतिराम ने इनमें से किसी को भी ग्रहण नहीं किया। रसवत्, प्रेयस, ऊर्ज्वस्वि, समाहित, भावोदय, भावसन्धिा और भावशबला – इन सातों अलंकारों के निरसन का कारण तो अपने आप में स्पष्ट ही है। जैसाकि निवेदन किया जा चुका है।

मतिराम रसवादी थे और चूँकि ये सातों अलंकार अपने मूलस्वरूप में रस की कोटि में ही आते हैं, अतएव अलंकार को काव्य-शरीर के भूषण मानने वाले इस व्यक्ति को यह कैसे स्वीकार होता कि काव्य की आत्मा उसके शरीर का आभूषण है।

रही बात इतर 16 अलंकारों की, उनमें प्रमाण के प्रत्यक्ष अनुमान, अपमान, शब्द, स्मृति, श्रुति अर्थापत्ति, अनुलब्धि, सम्भव और ऐतिह्य- इन 10 भेदों के आधार पर अलंकारों का वर्णन करना उन्हें न जंचा होगा।

कारण, ये सभी भेद अर्थ के बुद्धि पक्ष को चाहे आनन्द दे सकते हों, पर हृदय-पक्ष को नहीं। अतः ये रस के उत्कर्ष में ही कैसे सहायक हो सकते हैं। इसी प्रकार ‘संसृष्टि’ और ‘संकर के भेदों का वर्णन उन्होंने इसलिए करना उचित समझा होगा क्योंकि ये पूर्वोक्त 100 अलंकारों में से किन्हीं का मिश्रण मात्र होते हैं।

वे इनकी पुनरुक्ति कर विवेचन को विस्तृत करने से कोई लाभ नहीं । दूसरे प्रत्येक काव्योक्ति में प्रायः एक से अधिक अलंकारों का होना भी स्वाभाविक ही है- यह सामाजिक की अपनी योग्यता पर निर्भर करता है कि उसे उसमें कौन-कौन से अलंकार सूझते हैं।

शब्दालंकारों की उपेक्षा –

अन्त में मतिराम के विवेच्य अलंकारों के सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण और विचारणीय प्रश्न रह जाता है और वह यह कि उन्होंने अलंकार – विवेचन में शब्दालंकारों की उपेक्षा क्यों की है-विशेषतः उस दशा में जबकि अपनी कविता में इन सभी अलकारों का अत्यन्त स्वच्छ प्रयोग किया है। इस प्रश्न का समाधान यद्यपि यह कहकर किया जा सकता है कि उन्होंने अप्पयदीक्षित का ही इस विषय में अनुसरण किया है।

तथापि इस सम्बन्ध में यह प्रश्न पुनः उठ खड़ा होता है कि जब वे ‘मालोपमा’ आदि अर्थालंकारों में दीक्षित की मान्यताओं का उल्लंघन कर मम्मट और विश्वनाथ का आश्रय ले सकते थे तो इन अलंकारों के लिए उन्हें क्या आपत्ति थी ?

 

कहना न होगा कि हमारे पास इस तर्क का कोई समाधानकारक उत्तर नहीं है, फिर भी अनुमान से इतना ही कह सकते हैं कि उनकी दृष्टि में सम्भवतः अर्थहीन शब्द का महत्त्व नहीं रहा, इसलिए अर्थालंकारों को काव्योत्कर्ष का विधायक मानकर इन्हीं का वर्णन करना इन्होंने उपयुक्त समझा है।

यह भी पढ़े :—

  1. ललितललाम के काव्य-शिल्प का मूल्यांकन कीजिए |

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